भोजपुरी गानों में बढ़ती अश्लीलता: कारण, समाज की पसंद और बच्चों पर इसके गहरे प्रभाव
भोजपुरी दुनिया की उन भाषाओं में से एक है जो करोड़ों लोगों के दिलों में बसती है। लेकिन आज जब हम 'भोजपुरी गानों' का नाम लेते हैं, तो संगीत से पहले दिमाग में अश्लील शब्द और द्विअर्थी (double meaning) संवाद आने लगते हैं। आखिर क्यों यह समृद्ध भाषा आज अश्लीलता की पर्याय बनती जा रही है?
1. अश्लीलता के पीछे का 'बिजनेस मॉडल'
भोजपुरी गानों में अश्लीलता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा बिजनेस है।
कम बजट, ज्यादा मुनाफा: एक साफ-सुथरा और उच्च स्तर का गाना बनाने में पैसा और समय दोनों लगता है। इसके विपरीत, भड़काऊ और विवादित गाने सोशल मीडिया पर 'वायरल' जल्दी होते हैं।
एल्गोरिदम का खेल: यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर 'व्यूज' (Views) ही पैसा है। स्कैंडल और अश्लीलता लोगों का ध्यान खींचती है, जिससे रातों-रात लाखों व्यूज मिल जाते हैं।
सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता: उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में सस्ते डेटा ने इन गानों को हर हाथ तक पहुँचा दिया है।
2. लोग ऐसे गाने क्यों देखते हैं?
यह एक कड़वा सच है कि "डिमांड ही सप्लाई तय करती है।"
मनोरंजन का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन के अन्य साधनों की कमी होने के कारण लोग मोबाइल पर परोसे जा रहे इस 'मसालेदार' कंटेंट की ओर आकर्षित होते हैं।
स्वीकार्यता (Normalization): जब हर शादी, पार्टी और त्यौहार में ऐसे ही गाने बजते हैं, तो समाज धीरे-धीरे इन्हें सामान्य मानने लगता है।
शिक्षा की कमी: कला और संगीत की समझ विकसित करने के बजाय, फूहड़ता को ही मनोरंजन समझ लिया जाता है।
3. बच्चों पर प्रभाव (Impact on Kids in UP & Bihar)
यह इस समस्या का सबसे डरावना पहलू है। उत्तर प्रदेश और बिहार के बच्चे जिस उम्र में संस्कार और शिक्षा सीखते हैं, उस उम्र में उनके कानों में ये अश्लील शब्द पड़ रहे हैं।
व्यवहार में बदलाव: बच्चे इन गानों के बोल को दोहराते हैं, जिससे उनके बात करने के तरीके में अभद्रता आती है।
महिलाओं के प्रति नजरिया: इन गानों में अक्सर महिलाओं को केवल एक वस्तु (Object) की तरह दिखाया जाता है। इसे देखकर बड़े होने वाले बच्चों के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान कम हो जाता है।
मानसिक विकास पर असर: संगीत का काम तनाव कम करना है, लेकिन अश्लील संगीत कम उम्र में ही बच्चों को यौन विषयों की ओर धकेलता है, जो उनके मानसिक विकास के लिए हानिकारक है।
4. सुधार का रास्ता क्या है?
सेंसरशिप की ज़रूरत: जैसे फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, वैसे ही क्षेत्रीय संगीत के लिए भी सख्त नियम होने चाहिए।
श्रोताओं की ज़िम्मेदारी: जब तक हम (श्रोता) ऐसे गानों को सुनना बंद नहीं करेंगे, कलाकार इन्हें बनाना बंद नहीं करेंगे।
अच्छे कलाकारों को बढ़ावा: आज भी कई कलाकार साफ-सुथरी भोजपुरी गा रहे हैं, उन्हें सपोर्ट करना ज़रूरी है।
निष्कर्ष
भोजपुरी केवल एक भाषा नहीं, एक संस्कृति है। इसे फूहड़ता की बेड़ियों से आज़ाद करना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। हमें तय करना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या दे रहे हैं—लोक कला का माधुर्य या अश्लीलता का शोर?
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