नगर निगम में भ्रष्टाचार: चुनाव जीतने के बाद कुछ पार्षद किन अवैध तरीकों से कमाते हैं काला धन?
पिछले ब्लॉग में हमने बात की थी कि एक पार्षद (Councillor) की आधिकारिक जिम्मेदारियां, बजट और सैलरी क्या होती है। कानूनी तौर पर एक पार्षद को मिलने वाला मानदेय बहुत सीमित होता है। लेकिन फिर भी, नगर निगम (MC) चुनावों में उम्मीदवार पानी की तरह पैसा बहाते हैं।
सवाल उठता है कि आखिर क्यों लोग ₹20,000-₹30,000 की आधिकारिक सैलरी वाले इस पद के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार हो जाते हैं? जवाब है—सिस्टम की कमियां और भ्रष्टाचार के अवैध रास्ते। आज हम बिना किसी लाग-लपेट के उन गुप्त और अवैध तरीकों का विश्लेषण करेंगे, जिनका इस्तेमाल कुछ भ्रष्ट जनप्रतिनिधि अपनी जेबें भरने के लिए करते हैं।
1. विकास कार्यों में 'कमीशन' और 'किकबैक' (Contractor Commission / Kickbacks)
यह नगर निगमों में भ्रष्टाचार का सबसे पुराना और सबसे बड़ा जरिया है। वार्ड में सड़क बनना, नालियों की मरम्मत, या स्ट्रीट लाइट्स लगाने जैसे सभी काम प्राइवेट ठेकेदारों (Contractors) को दिए जाते हैं।
खेल कैसे होता है: कोई भी टेंडर उसी ठेकेदार को पास किया जाता है जो पार्षद और संबंधित अधिकारियों को पहले से तय 10% से 20% तक का फिक्स कमीशन (Cut-money) देने को राजी होता है।
नुकसान: इस कमीशनखोरी के चक्कर में ठेकेदार घटिया सामग्री का इस्तेमाल करते हैं, जिससे नई बनी सड़कें भी पहली ही बारिश में बह जाती हैं।
2. अवैध निर्माण और अतिक्रमण को संरक्षण (Protection to Illegal Construction)
शहरी इलाकों में बिना नगर निगम की मंजूरी (Map Passing) के इमारतें बनाना या व्यावसायिक गतिविधियों को चलाना गैरकानूनी है।
खेल कैसे होता है: जब कोई व्यक्ति अवैध रूप से अतिरिक्त मंजिल बनाता है या सरकारी जमीन (फुटपाथ) पर कब्जा करके दुकान लगाता है, तो निगम के बिल्डिंग इंस्पेक्टर कार्रवाई करने आते हैं। यहाँ कुछ भ्रष्ट पार्षद मध्यस्थ (Mediator) बनते हैं। वे अपनी 'शरण' या राजनीतिक संरक्षण देने के बदले मकान मालिकों या दुकानदारों से मोटी बंधी-बंधाई रकम (रिश्वत) वसूलते हैं।
3. स्थानीय वेंडर्स और रेहड़ी-पटरी वालों से हफ्ता वसूली (Extortion from Street Vendors)
हर शहर के बाजारों में सैकड़ों रेहड़ी-पटरी (Street Vendors) वाले होते हैं। नियमानुसार इनके पास 'वेंडिंग जोन' का पास होना चाहिए।
खेल कैसे होता है: जिन वेंडर्स के पास कागजात नहीं होते, उन्हें हटाने की धमकी देकर स्थानीय गुंडों या दलालों के जरिए 'हफ्ता' या 'महीना' वसूला जाता है। इस अवैध वसूली का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर स्थानीय भ्रष्ट नेताओं की जेब में जाता है।
4. ट्रांसफर-पोस्टिंग का बड़ा रैकेट (Transfer and Posting Racket)
नगर निगम के तहत काम करने वाले कर्मचारी (जैसे सेनेटरी इंस्पेक्टर, जूनियर इंजीनियर, क्लर्क, या सफाई कर्मचारी) अपनी मनपसंद जगह या 'कमाई वाले वार्ड' में पोस्टिंग चाहते हैं।
खेल कैसे होता है: कुछ ताकतवर पार्षद प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपने चहेते और भ्रष्ट कर्मचारियों का ट्रांसफर मलाईदार इलाकों में करवाते हैं। इस साठगांठ के बदले कर्मचारियों से भारी मात्रा में कैश लिया जाता है, जिसे बाद में वे कर्मचारी जनता से वसूलते हैं।
5. 'घोस्ट एम्प्लॉइज' यानी कागजी कर्मचारी (Ghost Employees Scam)
नगर निगमों में सफाई और रखरखाव के लिए बड़े पैमाने पर दिहाड़ी या कॉन्ट्रैक्ट पर कर्मचारियों को रखा जाता है।
खेल कैसे होता है: कागजों पर दिखाया जाता है कि वार्ड में 100 सफाई कर्मचारी काम कर रहे हैं, जबकि हकीकत में केवल 50 लोग ही ज़मीन पर होते हैं। बाकी के 50 फर्जी नामों (Ghost Employees) की सैलरी हर महीने बैंक से उठाई जाती है और यह पूरा पैसा भ्रष्ट अधिकारियों और पार्षदों के बीच आपस में बंट जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
जब तक जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी और यह नहीं समझेगी कि भ्रष्ट पार्षदों द्वारा कमाया गया एक-एक रुपया उनके टैक्स का पैसा है, तब तक इस व्यवस्था को बदलना नामुमकिन है। सूचना का अधिकार (RTI) का इस्तेमाल करके और अपने वार्ड के विकास बजट का हिसाब मांगकर ही हम इस तरह के काले धन के साम्राज्य पर लगाम लगा सकते हैं।
एक जागरूक नागरिक बनें, क्योंकि आपका मौन ही भ्रष्टाचार को ताकत देता है!
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