पोस्टर पर पत्नी, पीछे असली 'पार्षद': भारतीय स्थानीय चुनावों में 'पार्षद पति' संस्कृति का पूरा सच
जब भी नगर निगम (MC) के चुनाव आते हैं, तो गलियों में एक अजीब नजारा देखने को मिलता है। पोस्टरों पर एक महिला उम्मीदवार की मुस्कुराती हुई तस्वीर होती है, लेकिन उनके ठीक बगल में उनके पति की बड़ी सी फोटो लगी होती है जिस पर लिखा होता है—"निवेदक: अमुक कुमार (भावी पार्षद पति)"।
हैरानी की बात यह है कि उस पूरे इलाके में उस महिला उम्मीदवार को कोई नहीं जानता। लोग जानते हैं तो सिर्फ उनके पति को। फिर भी चुनाव पत्नी लड़ रही होती हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? आइए बिना किसी लाग-लपेट के इस व्यवस्था के पीछे छिपे 4 सबसे बड़े कारणों को समझते हैं।
1. महिला आरक्षण (Women's Reservation) की मजबूरी
इस खेल की शुरुआत होती है भारतीय संविधान के नियमों से। भारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए नगर निगम और पंचायत चुनावों में 33% से लेकर 50% तक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित (Reserved) की गई हैं。
खेल कैसे होता है: मान लीजिए कोई पुरुष नेता पिछले 10 साल से किसी वार्ड में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहा था। लेकिन चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग ने उस वार्ड को "महिला आरक्षित सीट" घोषित कर दिया। अब वह पुरुष नेता खुद वहां से चुनाव नहीं लड़ सकता।
समाधान: अपनी राजनीतिक विरासत और पावर को हाथ से न जाने देने के लिए वह नेता तुरंत अपनी पत्नी, मां या बहू को उम्मीदवार बना देता है। चूंकि टिकट पार्टी से उसके रसूख के कारण मिलना होता है, इसलिए पार्टी भी उसकी पत्नी को टिकट दे देती है।
2. केवल 'रबर स्टैंप' या प्रॉक्सी उम्मीदवार (Proxy Candidates)
चूंकि जनता केवल पुरुष नेता (पति) को पहचानती है, इसलिए वह महिला सिर्फ एक प्रॉक्सी यानी मुखौटा (Stand-in) बनकर चुनाव लड़ती है।
प्रचार का तरीका: चुनाव प्रचार के दौरान महिला उम्मीदवार अक्सर घर पर होती हैं या पुरुषों के पीछे घूंघट/परदे में चलती हैं। पति देव माइक संभालते हैं और जनता से कहते हैं, "वोट मेरी पत्नी को दीजिए, लेकिन आपके सारे काम पहले की तरह मैं ही करवाऊंगा।"
जीतने के बाद की हकीकत: चुनाव जीतने के बाद शपथ भले ही महिला लेती है, लेकिन नगर निगम के दफ्तरों में जाना, ठेकेदारों से डील करना, बजट तय करना और अफसरों के साथ मीटिंग करना—यह सारे काम अनौपचारिक रूप से उनका पति ही करता है। महिला सिर्फ उन सरकारी फाइलों पर हस्ताक्षर (Sign) करती है जहाँ कानूनन जरूरी होता है।
3. पितृसत्तात्मक सोच और सामाजिक ढांचा (Patriarchal Mindset)
हमारे समाज में आज भी यह माना जाता है कि "बाहर के काम और राजनीति पुरुषों का क्षेत्र है, और महिलाओं का काम घर संभालना है।"
जब एक महिला आरक्षित सीट से जीतती है, तब भी परिवार और समाज के पुरुष उसे स्वतंत्र रूप से प्रशासनिक फैसले लेने की छूट नहीं देते।
कई बार महिला उम्मीदवारों के पास प्रशासनिक समझ या शिक्षा की कमी होती है, जिसका फायदा उठाकर परिवार के पुरुष सदस्य पूरी सत्ता अपने हाथ में ले लेते हैं。
4. सत्ता और काले धन के साम्राज्य को बचाना
जैसा कि हमने पिछले ब्लॉग में चर्चा की थी, नगर निगमों में टेंडर कमीशन, अवैध निर्माण और प्रॉपर्टी टैक्स की सेटिंग के जरिए करोड़ों रुपये का खेल होता है।
अगर कोई सीट महिला आरक्षित होने पर पुरुष नेता अपने परिवार के बाहर किसी अन्य योग्य महिला को चुनाव लड़ा देता है, तो वह करोड़ों रुपये का 'कमीशन' और 'पावर' उसके हाथ से निकल जाएगी।
इसलिए, अपनी तिजोरी और राजनीतिक रसूख पर कब्जा बनाए रखने के लिए पत्नियों को मैदान में उतारना सबसे सुरक्षित रास्ता माना जाता है।
सरकार और कानून इस पर क्या कर रहे हैं?
यह समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि खुद देश के प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट ने इस 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' (Proxy Politics) पर गहरी चिंता जताई है।
Say No To Proxy: सरकार ने इस 'पार्षद/प्रधान पति' कल्चर को खत्म करने के लिए कई जागरूकता अभियान चलाए हैं।
सख्त नियम: अब कई राज्यों में यह नियम कड़ाई से लागू किया जा रहा है कि नगर निगम के जनरल हाउस या आधिकारिक बैठकों में महिला पार्षद के पति, भाई या बेटे को बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर कोई पति अपनी पत्नी की जगह आधिकारिक काम करते पाया जाता है, तो कानूनी कार्रवाई के भी प्रावधान किए जा रहे हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
संविधान ने महिलाओं को आरक्षण इसलिए दिया था ताकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला को ताकत मिले और वह खुद अपने फैसले ले सके。 लेकिन 'पार्षद पति' की इस कुप्रथा ने आरक्षण की मूल भावना को ही चोट पहुंचाई है。
बदलाव तब आएगा जब जनता जागरूक होगी। अगली बार जब आपके वार्ड में कोई महिला उम्मीदवार वोट मांगने आए, तो उनके पति से बात करने के बजाय सीधे उस महिला से सवाल पूछिए। उनसे पूछिए कि उनके क्षेत्र के लिए उनका विजन क्या है। जब तक हम मुखौटों को वोट देते रहेंगे, तब तक असली लोकतंत्र जमीन पर नहीं उतर पाएगा।
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