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Article Jul 15, 2026 61 views

स्क्रिप्टेड महाराज: पीआर की उंगली पर नाचते आधुनिक ‘परमपूज्य’ नेता

स्क्रिप्टेड महाराज: पीआर की उंगली पर नाचते आधुनिक ‘परमपूज्य’ नेता

आधुनिक राजनीति अब सेवा का जरिया नहीं रही, यह 'थिएटर' बन चुकी है। और इस थिएटर के सबसे बड़े अभिनेता हैं हमारे प्यारे नेताजी। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि बिना कोई काम किए, देश का बेड़ा गर्क करके भी चुनाव कैसे जीता जाता है, तो पेश है आज के "हाई-टेक, लो-काम" वाले स्क्रिप्टेड नेताजी का असली कच्चा चिट्ठा।

 

1. प्रेस कॉन्फ्रेंस? तौबा-तौबा, हमें तो सिर्फ कैमरे से प्यार है!

 

नेताजी को जनता से संवाद करना पसंद है, लेकिन सिर्फ तब, जब सामने बोलने के लिए 'टेलीप्रॉम्प्टर' हो। भगवान न करे कि कभी कोई पत्रकार इनसे बिना स्क्रिप्ट का सवाल पूछ ले! इसलिए नेताजी प्रेस कॉन्फ्रेंस के नाम से ही कतराते हैं। जब भी ये बाहर निकलते हैं, तो वह यात्रा नहीं, एक बकायदा 'शूट' होता है। हवा का रुख, धूप का एंगल, और रोती हुई जनता की टाइमिंग—सब कुछ पहले से डिसाइड होता है। ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा डायरेक्टर पीछे से चिल्ला रहा हो— "लाइट, कैमरा, और... हमारे महाराज की एंट्री!"

 

2. भविष्य की बातें छोड़ो, 'भूत' को पकड़ो

 

अगर आप नेताजी से पूछेंगे कि "युवाओं को नौकरी कब मिलेगी?" तो वह सीधे आपको सौ साल पीछे ले जाएंगे। वर्तमान की समस्याओं का उनके पास एक ही इलाज है—पिछली सरकारों को कोसना। ऐसा लगता है कि देश की हर समस्या के लिए आज के योजनाकार नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके लोग जिम्मेदार हैं। नेताजी का सीधा सा गणित है: "अगर हम काम नहीं कर सकते, तो कम से कम दोष तो दूसरों पर मढ़ ही सकते हैं!"

 

3. "हम तो पड़ोसी से बेहतर हैं!"

 

जब बात विकास की आती है, तो नेताजी सुपरपावर देशों से मुकाबला नहीं करते। वे गर्व से छाती ठोककर कहते हैं, "देखिए, बगल वाले देश में तो लोग भूखे मर रहे हैं, हम कम से कम जिंदा तो हैं!" यानी तरक्की का पैमाना यह नहीं है कि हम कितना आगे बढ़े, बल्कि यह है कि हमसे ज्यादा बर्बाद कौन हुआ। इसे कहते हैं 'नीचे की ओर देखना और खुश होना'।

 

4. धर्म की घुट्टी और इमोशनल ब्लैकमेल का कॉकटेल

 

वोट मांगने का सबसे आसान तरीका क्या है? काम गिनाना? बिल्कुल नहीं, उसमें तो मेहनत लगती है! सबसे आसान है—भावनाओं का धंधा। नेताजी चुनाव आते ही धर्म का चश्मा पहन लेते हैं और जनता को डराना शुरू कर देते हैं: "अगर मुझे वोट नहीं दिया, तो समझो देश खतरे में है!" समाज को आपस में लड़ाओ, नफरत की दीवारें खड़ी करो, और उस दीवार के ऊपर बैठकर अपनी सत्ता का महल बना लो।

 

5. बिना दिमाग वाली जनता: नेताजी का असली खजाना

 

नेताजी की यह पूरी नौटंकी सिर्फ इसलिए चल रही है क्योंकि उन्होंने एक ऐसी फौज तैयार कर ली है जिसने 'सोचना-समझना' पूरी तरह बंद कर दिया है। जहाँ तर्क और सवाल खत्म होते हैं, वहीं से नेताजी की अंधभक्ति शुरू होती है। जब तक लोग सोशल मीडिया की चमकीली रील्स को सच मानते रहेंगे और "क्यों और कैसे" पूछना भूल जाएंगे, तब तक नेताजी बिना कुछ किए देश के 'मसीहा' बने रहेंगे।

 

अंगारा लाल

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